Skip to content
-
Subscribe to our newsletter & never miss our best posts. Subscribe Now!
ABHIVYAKTI ABHIVYAKTI

ABHIVYAKTI भारतीय दर्शन,संस्कृति और गणित पर शोध एवं आलेख प्रस्तुत करता है।

ABHIVYAKTI ABHIVYAKTI

ABHIVYAKTI भारतीय दर्शन,संस्कृति और गणित पर शोध एवं आलेख प्रस्तुत करता है।

  • होम
  • गणित
  • आलेख
  • कविता
  • Photos
  • होम
  • गणित
  • आलेख
  • कविता
  • Photos
Close

Search

  • https://www.facebook.com/
  • https://twitter.com/
  • https://t.me/
  • https://www.instagram.com/
  • https://youtube.com/
Subscribe
आलेख

वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता

By Bharti Kumari
7 अक्टूबर 2026 5 Min Read
0

 

मेरे आलेख का विषय है वैश्विक परिप्रेक्ष्य में भारतीय जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता।जीवन मूल्य का तात्पर्य ‘शुभ’ या ‘आदर्श’ से है।मानव जीवन अनेक नियमों और आदर्शों से संचालित होता है और इन्हीं के द्वारा जीवन मूल्यों की स्थापना होती है।भारत में प्राचीन काल से हीं मनुष्यों में जीवन मूल्यों के उच्चतम आदर्शों की स्थापना के लिए भारतीय चिंतकों,मनिषियों,युग दृष्टाओं और विद्वान महाराजाओं द्वारा निरंतर प्रयास किए गए।उन उच्चतम आदर्शों का लक्ष्य मनुष्य में पाश्विक प्रवृत्तियों का निरोध करना है तथा सर्व कल्याण की भावना से समस्त चराचर विश्व का मंगल करना है।जिनमें मनु द्वारा बताए गए 10 धर्म अति महत्वपूर्ण हैं।यथा
                                                                धृति:क्षमादमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रह: धीर्विधा सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्।।
                इसके अतिरिक्त भारतीय वेद,उपनिषद,रामायण, महाभारत और भगवतगीता आदि महानतम ग्रंथों में भारतीय आदर्शों का विस्तृत वर्णन किया गया है।इन ग्रंथों में निहित शिक्षा प्रत्येक व्यक्ति के नैतिक उत्थान के लिए है जो मन, वचन और कर्म से अहिंसा का पालन तथा समष्टि भाव से सभी के प्रति निष्ठावान होने की शिक्षा देती है।यहां समष्टि के कल्याण के लिए समाजसेवा को प्रधान और सर्वोच्च माना गया है।इसमें भौतिक आवश्यकताओं को गौण रखते हुए आध्यात्मिक आवश्यकताओं को प्रमुख स्थान दिया गया ताकि जीवन मूल्यों का सरंक्षण किया जा सके।

               आज विश्व में सर्वत्र आर्थिक और भौतिक समृद्धि के लिए सभी में व्यक्तिगत, सामाजिक और राष्ट्र स्तर पर आपसी टकराव हो रहे हैं।सभी साधन की शुचिता का परवाह किए बगैर साध्य की प्राप्ति में लीन हैं।मनुष्य जीव- जंतुओं पर, पूंजीपति वर्ग गरीब वर्ग पर और शक्तिशाली राष्ट्र अपने से कमजोर राष्ट्र पर बलपूर्वक अपना शासन करने में लगे हुए हैं।इस अमानवीय प्रतिस्पर्धा में प्रकृति,मानव और अन्य जीवों की निरंतर क्षति होती आ रही है।उदाहरण रूप में कुछ प्रमुख घटनाओं को देखा जा सकता है-

1.प्रथम एवं द्वितीय विश्व युद्ध – यह युद्ध साम्राज्यवाद,टकराव,महत्वाकांक्षा, आपसी प्रतिस्पर्धा, तनाव और हिंसा का परिणाम था। इसके अतिरिक्त अन्य राष्ट्रों के मध्य संघर्ष जैसे इराक- ईरान युद्ध जो लगातार 10 वर्षों तक चला।वर्तमान में इजरायल और हमास के बीच संघर्ष से हो रही क्षति हमारे समक्ष है।

2.जलवायु परिवर्तन से हो रही जीवन की क्षति- वर्तमान में जलवायु परिवर्तन के कारण मानव जीवन तो प्रभावित हो ही रहा है साथ-साथ विविध जीवों की प्रजातियाँ भी नष्ट हो रही हैं;जिसका मुख्य कारण आज विश्व में मनुष्यों द्वारा की जा रही निरंतर नई-नई खोजें हैं।प्रगति के नाम पर लागातार बर्बाद हुए प्राकृतिक संसाधन आज जलवायु परिवर्तन के रूप में उभरकर सामने आया है।हम जिस प्रगति की बात करते हैं उसकी दिशा है तनाव,हिंसा,प्रतिस्पर्धा। मानवीय आविष्कारों से हिंसा को अलग करना मुश्किल है।नित्य नवीन खोज से हमारा मन ठीक उसी प्रकार तृप्त नहीं हो सकता है जिस प्रकार ईंधन से अग्नि कभी शांत नहीं होती है।

3.माओ का ‘गौरैया सफाई अभियान’- यह अभियान चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के सर्वोच्च नेता माओं के ‘मारो चार’ अभियान का हिस्सा था जिसमें लक्षित चार(मक्खी,मच्छर,चूहा और गौरैया) जीवों को पूर्णत नष्ट करना था।माओं का मानना था कि अकेले गौरैया एक साल में 4 किलो अनाज खा जाती है जो कि चीनी नागरिकों के हिस्से का भोजन है। इसलिए उन्होंने गौरैयों के पूर्ण सफाया अभियान चलाया।लाखों की तादाद में गौरैया को मारने के लिए माओं ने अलग-अलग रणनीति अपनाई।जिसका परिणाम यह हुआ 1 साल के भीतर ही ‘कॉएकेशिएन ट्री स्पैरो’ खत्म हो गई। माओं का यह अभियान सफल रहा परंतु जल्द ही इससे चीनी पारिस्थितिकी संतुलन बिगड़ने लगा।गोरैया खत्म होने से अवांछित टीडडों और कीड़ों की संख्या बढ़ गई।1958- 60 के बीच बाढ़ का सामना और टिड्डियों के हमले ने चीन में खदान संकट को बढ़ा दिया।आखिरकार 1960 में माओं ने गौरैया सफाई अभियान को वापस लेने की घोषणा की और पुनः गौरैया का पालन प्रारंभ किया।

4 हसदेव जंगल विवाद- भारत के वनाच्छादित हृदयस्थल के नाम से मशहूर हसदेव जंगल जो मुख्य रूप से आदिवासियों का निवास स्थान है।कोयले की आपूर्ति हेतु15,000अनुमानित पेड़ों को काटा गया जो 91 हेक्टेयर भूमि पर खड़े थे।यह भारत के सबसे बड़े सन्निहित वन क्षेत्रों में से एक है।एक सरकारी शोध संस्थान के अनुसार यह ‘दुर्लभ,लुप्तप्राय और संकटग्रस्त जीव’का घर है।हसदेव जंगल को काटने से जहां एक तरफ वनों पर आश्रित लोगों के आजीविका के स्रोत समाप्त हो गए वहीं इसमें पेड़ों की 30 से अधिक प्रजातियाँ नष्ट हो गई।साथ हीं सैकड़ों आदिवासी परिवार विस्थापित हो गए तथा हजारों अन्यों के विस्थापित होने का खतरा है।
             उपर्युक्त घटनाओं के परिणामस्वरूप हुई क्षति को जानने के बाद यह स्पष्ट होता है कि स्वार्थ से वशीभूत मानव को अपनी महत्वकांक्षा की उन्माद में अन्य जीवधारियों के सुख और अधिकार की सुध नही है।जो मनुष्य के जीवन मूल्यों के स्तर में हो रहे ह्रास को दर्शाता है। इसीलिए आवश्यक है कि साध्य के साथ-साथ साधन की पवित्रता को भी ध्यान में रखा जाए तभी सही मायने में समष्टि का कल्याण हो सकेगा।प्रगति की परवाह में संस्कृति में विकृति का आना संभव है किंतु ससमय संशोधन कर उस विकृति का शमन करना भी आवश्यक है।विश्व की ऐसी कई संस्कृतियां हैं जो अपने मूल तत्व में उत्पन्न विकार के कारण नष्ट हो गई हैं जिनमें मिस्र, बेबीलोन, यूनान और रोम की सभ्यता प्रमुख है।वही भारतीय संस्कृति आज भी मजबूती के साथ टिकी हुई है जिसके मूल में‘वसुधैवकुटुम्बकम’,‘अहिंसा परमों धर्म:’ , ‘अतिथि देवो भव:’,‘परोपकाराय सतां विभूतय:’,‘तेन त्यक्तेन भूंजिथा’ का उत्कृष्ट आदर्श समाहित है। इन्ही आदर्शो की राह पर चलकर विश्व में शांति और सद्भाव की स्थापना की जा सकती है।भारतीय संस्कृति किसी भी अन्य संस्कृति की उपेक्षा करना नहीं सिखाती परंतु उसे धर्म से संयमित और संचालित करना सिखाती है
                 आज विश्व को भारतीय आदर्शों को अपनाने की आवश्यकता है,क्योंकि यह नित्य नई- नई खोजों के पीछे अंधा होकर भागने की शिक्षा नहीं देती बल्कि आत्म संयम, परार्थ भावना, परोपकार,दान ,ईश्वरीय ज्ञान और निष्काम कर्म की शिक्षा देती है। साथ ही आध्यात्मिक उन्नति पर बल देती है क्योंकि अध्यात्म को अपनाने वाला व्यक्ति और समाज वह कार्य नहीं करेगा जिसे दूसरे व्यक्ति समाज और राष्ट्र को हानि हो।

               पूर्व आदर्शों की अवहेलना का परिणाम हमारे लिए घातक हो सकता है,क्योंकि जिस मार्ग पर संपूर्ण विश्व चल पड़ा है उस मार्ग से केवल भयानक रक्तपात और तबाही होगी।उससे किसी नैतिक प्रतिमान की स्थापना नही हो सकेगी;क्योंकि हिंसा-हिंसा को जन्म देती है। विश्व में फैली हिंसा,संघर्ष और युद्ध का एकमात्र मार्ग शांति है जो कि भारतीय आदर्शों का अनुसरण करके ही संभव है।यहां जीवो पर दया और उनके प्रति सेवा भावना को सबसे बड़ा धर्म माना गया है। संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय संस्कृति की विशेषता विषमता, प्रतिस्पर्धा और अशांति को दूर कर समता, समानता और शांति का साम्राज्य स्थापित करना है।यहां साम्राज्य का संबंध सर्वभूतहिते रत: से है।अर्थात सर्वभूत हित की दृष्टि से साम्राज्य की स्थापना।ऐसा करने से हीं मनुष्य,समाज और संस्कृति को पतन और विनाश से बचाया जा सकता है।

संदर्भ –
हिंदू संस्कृति अंक,गीताप्रेस गोरखपुर
BBC NEWS
DW DOCUMENTRY

Tags:

जीवन मूल्यजीवन मूल्यों के उच्चतम आदर्शभारतीय जीवन मूल्य
Author

Bharti Kumari

A scholar. NET And PHD in Philosophy.

Follow Me
Other Articles
Previous

संख्या में अंकों की व्यवस्था

Next

अभाज्य संख्याएँ

No Comment! Be the first one.

    प्रातिक्रिया दे जवाब रद्द करें

    आपका ईमेल पता प्रकाशित नहीं किया जाएगा. आवश्यक फ़ील्ड चिह्नित हैं *

    Copyright 2026 — ABHIVYAKTI. All rights reserved. Blogsy WordPress Theme