(गांधी जयंती, 2 अक्टूबर 2026)
वर्तमान वैश्विक परिप्रेक्ष्य में गांधी के विचारों की प्रासंगिकता
डॉ भारती कुमारी
गांधी आमतौर पर आंदोलन और आजादी के नेता माने जाते हैं; शोधकर्ता के नाते यह सवाल है कि संकोची बालक कैसे वैश्विक चेतना बना? जब मैं उनके मूल जीवन दृष्टि को गहराई से देखती हूं तो प्रतीत होता है कि उनकी आंतरिक शक्ति उन्हें साधारण इंसान से वैश्विक चेतना के रूप में गढ़ती है। जब महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन ने गांधी के विषय में कहा था कि “आने वाली पीढ़ियां शायद ही विश्वास करेंगी कि हाड़- मांस से बना ऐसा कोई व्यक्ति कभी इस धरती पर पैदा हुआ था”,तब वह सिर्फ एक राजनेता की प्रशंसा नहीं कर रहे थे बल्कि उस आश्चर्य को व्यक्त कर रहे थे जो साधारण मनुष्य के असाधारण नैतिक रूपांतरण से पैदा होता है।
आज गांधी जी के दुर्लभ आंतरिक गुणों का विश्लेषण करना बेहद प्रासंगिक है-
कथनी और करनी की प्रमाणिकता– गांधी जी का यह गुण उन्हें अन्य राजनेताओं से अलग बनाता है। गांधी दूसरों को बदलने से पहले खुद में बदलाव करने की बात करते थे। विद्वान प्रोफेसर डीजी धीमन के शोध पत्रों के अनुसार गांधी ने जीवनभर नि:स्वार्थता, विनम्रता और सेवा के शाश्वत मूल्यों को खुद में उतारा।उनका प्रसिद्ध कथन है- “मेरा जीवन ही मेरा संदेश है।”
विरोधियों के प्रति प्रेम और गरिमा की भावना- गांधी विचारों से लड़ते थे व्यक्ति से नहीं।उन्होंने कहा भी है “पाप से घृणा करो पापी से नहीं” यही कारण है कि उन्होंने अपने विरोधियों के लिए कभी भी नफरत का प्रयोग नहीं किया। जनरल जाॅन स्मट्स गांधी के विषय में लिखते हैं कि “मैंने कई वर्षों तक एक ऐसे व्यक्ति की सैंडल पहनी है जिसे मैं खुद जेल में भेजा था ……मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मैं उस महान व्यक्ति की बराबरी करने के योग्य भी नहीं हूं।
अपनी गलतियों को सार्वजनिक रूप से स्वीकार करना – गांधी जी ने अपनी हर छोटी-बड़ी गलतियों को दुनिया के समक्ष स्वीकार किया।वे अपनी आत्मकथा ‘सत्य के साथ मेरे प्रयोग’ में स्वयं लिखते हैं कि वह कोई पैदाइशी महापुरुष नहीं थे।अपनी आत्मकथा की शुरुआती अध्यायों में मांस खाना, चोरी करना और पिता के समक्ष लिखित दोष स्वीकृति को लिखते हैं। अपनी हर छोटी बड़ी मानवीय भूल को स्वीकार कर, उनमें सुधार करना और उन्हें न दोहराने का संकल्प गांधी जी की सबसे बड़ी अच्छाई थी।
अकेले खड़ा होने का साहस– 1946-1947 (नोआखाली) में जब पूरे देश में सांप्रदायिक दंगे की आग फैली थी,तब अकेले 77 वर्ष का वृद्ध व्यक्ति बिना किसी हथियार के शांति स्थापित करने पहुंचे। भारत के अंतिम वायसराय लॉर्ड माउंटबेटन गांधी के इस अदम्य साहस को देखते हुए उन्हें ‘वन मैन बाउंड्री फोर्स’की उपाधि दी थी। माउंटबेटन ने गांधी को पत्र लिखा था -“पंजाब में हमारे पास 55000 सैनिक हैं और बड़े पैमाने पर दंगे हो रहे हैं , बंगाल में हमारी सेना में सिर्फ एक आदमी (आप) है और वहां कोई दंगा नहीं है।
नैतिक युद्ध नीति– युद्ध का सामान्य नियम है जब शत्रु संकट में हो,तब उस पर हमला कर देना या उसका फायदा उठाना, लेकिन गांधी जी इसे कायरता मानते थे। उनका कहना था “शत्रु की कमजोरी का लाभ मत उठाओ” इसका उदाहरण देखा जा सकता है – प्रथम विश्व युद्ध के दौरान जब ब्रिटिश सरकार संकट में थी तब गांधी ने भारत में किसी भी बड़े आंदोलन की शुरुआत नहीं की बल्कि नैतिक रूप से संकट टलने की प्रतीक्षा किया।cd
पर निंदा से दूरी और मौन व्रत– गांधी जी किसी भी परिस्थिति में किसी व्यक्ति की पीठ पीछे उसकी निंदा नहीं करते थे अगर वे किसी से सहमत नही होते तो सीधे उस व्यक्ति को बोलते या पत्र लिखते थे और इसी आत्म शुद्धि के लिए गांधी हफ्ते में एक बार मौन व्रत रखते थे।
अहंकार का पूर्ण त्याग– अपनी आत्मकथा के अंतिम अध्याय में गांधी लिखते हैं -“सत्य को पाने के लिए स्वयं को शून्य के स्तर पर लाना जरूरी है।”
अहिंसा की आध्यात्मिक गहराई– गांधी अपने विरोधियों को नफरत की जगह प्रेम से बदलना चाहते थे। 1939 में एक लेख में लिखते हैं-“संपूर्ण समाज अहिंसा के माध्यम से आपस में जुड़ा हुआ है, ठीक वैसे ही जैसे पृथ्वी अपने गुरुत्वाकर्षण के कारण अपने स्थान पर टिकी हुई है।”
अंत्योदय – अंत्योदय का अर्थ है – ‘समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति का उत्थान।’गांधी जी राजनीति को सत्ता का माध्यम नहीं बल्कि समाज के पिछड़े लोगों की सेवा का जरिया मानते थे।
वैश्विक चेतना के रूप में इन दुर्लभ गुणों का प्रभाव – नमक सत्याग्रह में असाधारण नैतिक प्रभाव को देखते हुए प्रतिष्ठित अमेरिकी पत्रिका ‘टाइम’ ने गांधी जी को ‘मैन ऑफ द ईयर'(1930) घोषित किया। इस पत्रिका ने उन्हें वैश्विक स्तर पर स्थापित कर दिया।इसमें शामिल होने वाले वे पहले भारतीय थे ।गांधी विश्व में शोषित समाजों की नैतिक आवाज बनकर उभरे।मार्टिन लूथर जूनियर किंग, नेल्सन मंडेला और आंग सान सूकी को गांधी के विचारों से प्रेरणा मिली। इसके अतिरिक्त रोम्या रोलां, पर्ल एस बक , और दलाई लामा भी गांधी से प्रभावित थे।
पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा कहते हैं कि “यदि मुझे जीवित या मृत व्यक्ति के साथ डिनर करने का अवसर मिलता है तो वह व्यक्ति गांधी हो सकते हैं, क्योंकि वह मेरे असली हीरो हैं।
अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन गांधी के विषय में कहते हैं कि-” वह एक महान व्यक्ति हैं जिनके विचारों और कार्यों का दुनिया पर एक स्थाई प्रभाव पड़ा है।” गांधी के वैश्विक प्रभाव और स्वीकार्यता को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र ने 2 अक्टूबर(उनके जन्मदिन )को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस घोषित किया है। गांधी कल भी मार्गदर्शक थे और आज भी मार्गदर्शक हैं। गांधी कोई व्यक्ति नहीं बल्कि वैचारिक प्रक्रिया हैं ।आज हम गांधी को कहां भूल रहे हैं? यह आत्मनिरीक्षण का विषय है।
संदर्भ –
www.mkgandhi.org
www. researchgate.net
Jansatt.com
Hindi.news.18.com
The times of india.com